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Aparigrah-Yama in Yoga

योग के प्रथम अंग ‍यम के पांचवे उपांग अपरिग्रह का जीवन में अत्यधिक महत्व है। जैन धर्म में इसे बहुत महत्व दिया गया है। संसार को सहजता और प्रसन्नता से भोगने के लिए अपरिग्रह की भावना होना जरूरी है। इसे सामान्य भाषा में लोग त्याग की भावना समझते हैं, लेकिन यह त्याग से अलग है।

अपरिग्रह को साधने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आ जाता है साथ ही वह शारीरिक और मानसिक रोग से स्वत: ही छूट जाता है। अपरिग्रह की भावना रखने वालों को किसी भी प्रकार का संताप नहीं सताता और उसे संसार एक सफर की तरह सुहाना लगता है।

अपरिग्रह का अर्थ है किसी भी विचार, व्यक्ति या वस्तु के प्रति आसक्ति नहीं रखना या मोह नहीं रखना ही अपरिग्रह है। जो व्यक्ति निरपेक्ष भाव से जीता है वह शरीर, मन और मस्तिष्क के आधे से ज्यादा संकट को दूर भगा देता है।

 जब व्यक्ति किसी से मोह रखता है तो मोह रखने की आदत के चलते यह मोह चिंता में बदल जाता है और चिंता से सभी तरह की समस्याओं का जन्म होने लगता है।
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